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R.K. Telangba


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प्यार की इंडस्ट्री -Valentine Contest

Posted On: 11 Feb, 2011  
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प्यार, इश्क, मोहब्बत बनाम वेलेंटाइन – Valentine Contest

Posted On: 8 Feb, 2011  
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तिरंगे पर राजनीति

Posted On: 25 Jan, 2011  
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Others पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आदरणीय भाई साहब , आप के बातों में आक्रोश सपष्ट झलक रहा है , आप की बात से मैं पूर्णता सहमत हूँ. आप ने ठीक ही कहा कि हम जैसे निठल्ले लोग ब्लॉग लिख कर अपने मन की भड़ास निकाल रहे हैं, इस से ज्यादा हम कर भी क्या सकते हैं ? छिपकली का बच्चा मगरमच्छ कब बन गया इस के पीछे किस का हाथ है ? कहाँ गयी वो मीडिया जो किसी के भी बेडरूम में घुस कर सनसनीखेज़ खुलासा करने को आतुर रहा करती है. कहाँ गयी सी. बी. आई. और दूसरे जांच विभाग ? क्यों सरकार क्यों कुम्भकर्ण की नींद सो रही है. आप ने ठीक ही फ़रमाया कि आस्तीन में पलने वाले संपोड़े को समय रहते ही कुचल दिया जाना चाहिए. हम दरसल खुद अपने हाथ गंदे नहीं करना चाहते. हम हमेशा यह उम्मीद लिए बैठते है की कोई फ़रिश्ता आ कर इन सब से हमे बचाए... लम्बे समय से चला आ रहा यह घिनौना कारोबार आखिर किस की शह पर चल रहा है ? आज सभी जाने माने अख़बारों के कलम के सिपाही नोटों की चमक के आगे अपना ईमान बेच चुके हैं . अब आप बताइए किस से फ़रियाद की जाए ?? अगर हम कुछ कडवा सच लिख देते हैं तो हमारे ब्लॉग जागरण के पोर्टल से हटा दिए जाते हैं. आखिर किया क्या जाए ? किस पर यकीन किया जाये ? पानी सर से ऊपर जा चुका है. !!

के द्वारा: R.K. Telangba R.K. Telangba

यही तो मान्यवर ! जब आसमान पूरी तरह टोरनेडो की चपेट में आ जाता है, तभी हमारे यहाँ के लोगों को तवीयत से पत्थर उछालने की सूझती है . जब अंधविश्वासी जाल के पूत के पाँव पालने में होते हैं, उसी वक़्त यदि उसका खतना करा दिया जाय, तो बड़े आपरेशन की ज़रूरत ही क्यों पड़े ? जब किसी कथित ढोंग की शुरुआत होती है, उस समय सभी की आँखें बंद होती हैं . फ़िर जैसे ही दौलत की बरसात दिखने लगती है, सोए बुद्धिजीवियों के पेट में ही सबसे पहले मरोड़ उठती है, क्योंकि लम्बे समय से भोजन नसीब नहीं हुआ होता है . इस सच्चाई से मुँह न मोड़िये . अपने-अपने घरों में झाँक कर देखिये कि सुबह उठकर कौन-कौन टीवी देखता है . घर वालों के सामने तो घिग्घी बंधी होती है, और भँड़ास निकालते हैं ब्लाग लेखन कर के . कम से कम आप जैसों की कलम के भरोसे तो आज तक कोई उपचार नहीं ही हो पाया है . जो होता है, परिस्थितियाँ ही खुद को आज तक संतुलित करती आई हैं . हाँ, लिखने को मुफ़्त में गरम मसाला ज़रूर मिल जाता है . सारे निठल्लों का सम्मेलन स्थल यही है .

के द्वारा:

कालिया जी ...आप अपनी जगह ठीक है और हम अपनी जगह......भारत में न जाने कितने ज्ञानिओं और अव्तारिओं ने जन्म लिया ...और न जाने किनते देवी - देवताओं को पूजा जाता है यहाँ ......क्यूँ की वो सच में ज्ञानी और अवतारी थे.....और उनेह आज भी पूजा जाता है....न की बाबाओं को......वो भी ऐसे बाबा जो पैसे लेकर कृपा बनते है....अप ही सोचो की पैसे से कभी कृपा खरीदी जाती है क्या ?....और रही निर्मल बाबा की बात वो जिंदगी में हर जगह से असफल रहे ....और कुछ बन न सके तो "निर्मल बाबा " बन गए.....२००० Rs में कृपा बाँट रहे है अब.....कालिया जी अगर आपमें दिमाग है तो जरा सोचिये ...आपको नही लगता के वो भोली भली जनता के साथ खेल रहे है .....अगर उनके पास सच में तीसरी आँख है तो वो क्यूँ नही मुफ्त में लोगों को कृपा बांटते है......या फिर आप पे भी इस झूठे बाबा की तारीफ करके कृपा आने वाली है हा हा हा .......मैं यह नही कहती की सब बाबे बन जाओ पर यह जो गलत हो रहा है उसे तो अपनी कलम द्वारा रोका जा सकता है .....R k जी ठीक लिखा है ....हम आंखे बंद करके तो नही बैठ सकते न......अच्छा लिखा अपने R k जी...

के द्वारा:

के द्वारा: rktelangba rktelangba

भाई साहब आप ने या तो ब्लॉग ठीक से पढ़ा नहीं या फिर पढ़ कर भी आप समझ नहीं पाए. जैसा कि आप को मेरे विचार सड़े - गले लग रहे हैं तो आप बताइए ताज़ा और आधुनिक विचार क्या है ? आज कल जो बाबे मीडिया का सहारा ले कर सरे आम ठग रहे हैं क्या यह सब उचित है. दुखी , परेशान और गरीब आदमी को झूठे सपने दिखा कर लालच दे कर पैसे ऐंठ लिए जा रहे हैं क्या यह सब उचित है? दूसरी बात यह है कि मैं यह सब लिख कर किसी को अपना पिछलग्गू नहीं बना रहा न ही मेरी किसी से प्रतिद्वंदिता है. आप को अगर मेरे विचारों में इर्ष्या की बू आ रही है तो यह आप की गलत फहमी है क्यों कि मैं न तो किसी लाचार, दुखी या मुसीबत में फंसे हुए आदमी को मामू बना कर पैसे ऐंठने के पक्ष में हूँ और न ही मैं ऐसा होने दूंगा. आज घर - घर में टीवी के माध्यम से ठग बाजारी का जो धंधा चल पड़ा है उस के सब से ज्यादा लोग वही होते हैं जो दुःख और मुसीबत झेल रहे होते हैं. यह तो विज्ञापन का जादू है जो एक पढ़े लिखे इंसान की भी बुद्धि भी कुंद कर रहा है. जहाँ तक भय, भूख और भ्रष्टाचार है यह सरकार की गलत नीतियों का नतीजा है. लेकिन गलत नीतियों के खिलाफ जब तक आवाज़ नहीं उठाएंगे तब तक यह सब चलता रहेगा. यहाँ मैंने यह नहीं कहा कि सभी बाबे एक जैसे होते हैं. कुछ बाबाओं ने देश के लिए अच्छा योगदान दिया, योग और संयम का पाठ पढाया मगर कुछ ऐसे भी हैं जो टीवी में विज्ञापन दे दे कर अपना धंधा चला रहे हैं, इस तरह के बाबाओं ने भक्तो से कभी यह नहीं कहा कि मेहनत करो , इमानदार बनो , कर्म करो बल्कि मूर्खतापूर्ण और तर्कहीन उपाय बता कर लोगों को गुमराह किया है और कर्मठ की जगह भाग्यवादी बनाने का प्रयास किया है. आप ज़रा सोचिये क्या चमड़े के काले रंग का पर्स रखने मात्र से किसी को सम्पन्नता आ सकती है या फिर छोले भठूरे , समोसे या गोलगप्पे खाने से भाग्य बदल सकता है ?? लेकिन इस तरह के तर्कहीन और मूर्खतापूर्ण टिप्स दे कर लोगों को भावनात्मक रूप से ब्लेकमेल कर के लूटा जा रहा है. रही बात मंदिरों में जा कर अलख जलने की तो मेरा यह तात्पर्य नहीं है कि मैं किसी धर्म के खिलाफ बोलूं. लेकिन धर्म के नाम पर जो धंधे बाज़ी हो रही है या ठग बाजारी का खेल चल रहा है उसी को देखते हुए मुझे यह लेख लिखना पड़ा. और मुझे रोकने वाले सिर्फ वो लोग हो सकते हैं जो खुद इस तरह के पेशे से जुड़े हुए होंगे. धन्यबाद.

के द्वारा: rktelangba rktelangba

अब आप क्या चाहते हैं भाई साहब ? भूख, भय और भ्रष्टाचार से पीड़ित जनता को किसी करवट तो चैन की सांस लेने दीजिये ! आप जैसे तथाकथित बुद्धिजीवियों के झांसे में आकर ही अन्धविश्वासी जनता को आज तक क्या मिल पाया कि वह अब बाबाओं को छोड़कर आपके सड़े विचारों की पिछलग्गू बन जाय ? आपकी भाषा में यदि कुछ ग्राह्य है तो मात्र ईर्ष्या की सडांध, जिसकी बदबू अरण्यरोदन करते कहती प्रतीत होती है कि यह चंचला लक्ष्मी आखिर मुझ जैसे विद्वान को छोड़कर इन कथित पाखंडियों पर ही क्यों इतनी मेहरबान है ? सवाल यह है कि भय भूख और भ्रष्टाचार से निजात दिलाने की दिशा में आजतक आपका क्या योगदान है, जिसके आधार पर आपके इस प्रलाप को सत्य मान लिया जाय ? आप भी जानते हैं कि कमीना इंसान जब बिना फायदे के अपने बाप का सगा नहीं होता तो किसी बाबा का क्या होगा ! सपने ही खरीदकर यदि जनता खुश है, तो किसीको तकलीफ नहीं होनी चाहिए, क्योंकि आप जैसों का काम निराशा और दु:स्वप्न बांटने के अलावा कुछ भी नहीं होता. बाबाओं ने तो कम से कम जुए और शराब के अड्डों की भीड़ को मंदिरों की और मोड़ने का काम कर दिखाया है, आप में दम है, तो ज़रा मंदिरों पर जमा भीड़ के बीच जाकर अलख जगाने की हिम्मत कर दिखाइये, कि आप लोगों का किसी बाबा के कहने पर मंदिर आना आपके हित में नहीं है, फिर देखिये कि आपको अपनी औकात का कैसे मिनटों में पता चल जाता है !

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